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काबा/किबला के तरफ पैर करने के अहकाम

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अल्लाह ﷻ कुरान में फरमाते है:

..और हमने ये किताब नाज़िल फ़रमाई है जिसमें हर चीज़ का शफ़ी बियान है और हिदायत और रहमत और ख़ुशख़बरी है मुसलमानों के लिए।

(अल इसरा:८९)

۩ रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया,

"सबसे बेहतर कलाम अल्लाह की किताब है और सबसे बेहतरे तारीख़ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तारीख़ा है..."

सहीह बुखारी, हदीस-३८२ 

क़ुरान और सही हदीस में कहीं भी लिखा नहीं है कि काबा की तरफ जोड़ा नहीं जाना चाहिए। अगर आप सही हदीस पढ़ेंगे तो हमें मालूम होगा कि रसूलल्लाह ﷺ के जमाने में सहाबा काबा पर चढ़ कर अज़ान देते थे। (अल-हदीस)

यहां तक ​​कि सही हदीसों में अता है कि रसूलअल्लाह ﷺ ने काबा के अंदर नमाज पढ़ी। और जाहिर सी बात है कि जब काबा के अंदर आप नमाज पढ़ेंगे और जब सजदे में जाएंगे तो खुद-बखुद एपी का जोड़ा कबा के तरफ इशारा करेगा।

۩ ये रिवायत किया गया था कि इब्न उमर ने फरमाया, “रसूलुल्लाह ﷺ काबा के अंदर गए और वो बहार आने वाले थे, जब मैंने कुछ सोचा, इसलिए जल्दी आया और मैंने रसूलल्लाह ﷺ को बाहर आते देखा। मेन बिलाल र.अ. से पूछा: क्या रसूलल्लाह ने काबा के अंदर नमाज पढ़ी?

अनहोने कहा 'हा, दो रकात पढ़ि दो सुतुनो के बिच में।'

सुन्नन अन-नसाई, २९०७ (सहीह)।

हमें इस्लाम को अपने फिरके के ज़माने से नहीं बल्कि अल्लाह और उसके रसूल के तरीके से समझना चाहिए। और इस्लाम में शिद्दत-पसंद को चोर कर आसान को अपनाना चाहिए।

۩ रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

"(दीन में) लोगो के लिए कुछ आसान किया करो और शक्ति ना किया करो और उन्हें खुश-खबरी सुनाया करो और मायुस ना किया करो।"

सहीह अल बुखारी (६९) और सहीह मुस्लिम (१७३४)।


۩ रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

बेशाक़ अल्लाह ताला नरमी करने वाले हैं और नरमी को पसंद करते हैं और नरमी पे वो सवाब देते हैं जो ताकत पे नहीं देते।

सुनन अबू दाऊद, हदीस ४८०७।

शेख इब्न 'उथैमीन से क़िबला के तरफ जोड़ी करके सोने का हुक्म पूछा गया था। अनहोन फरमाया:

"हमारे शक्स के ऊपर कोई इल्ज़म नहीं है अगर वो क़िबले के तरफ जोड़ी करके सोता है"।

फतावा अल-शेख इब्न उथैमीन, २/९७६।

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