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नमाज़ ए वित्र की दुआ ए क़ुनूत में हाथ उठ जाए या नहीं?

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नमाज़ ए वित्र की दुआ ए क़ुनूत में हाथ उठे के बारे में कोई मार्फ़ू रिवायत नहीं है लेकिन हदीस के किताबों में बाज़ सहाबा ए करम र.अ. के आसार मिलते हैं. इस्लामी शरीयत में जब कोई बात रसूलुल्लाह से ना मिले और सहाबा से वो अमल मिल जाए बिना किसी दूसरे सहाबा का एतराज़ किया तो हमें अमल को अपने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन बेहतर यहीं होगा कि हाथ बंद के दुआ ए क़ुनूत पढ़ी जाए क्योंकि हाथ उठाने की कोई मार्फू हदीस नहीं है।

इस्के मुतल्लिक शेख जुबैर अली ज़ई का रिसाला अल हदीस जो कि रजब १४३० हिजरी को शाया हुआ था उस रिसाले के सफा नं. १२ पर एक सवाल किया गया था कि, नमाज़ ए वित्र में रुकू से क़ब्ल हाथ उठे बिना क़ुनूत पढ़ने की क्या दलील है?

जिसके जवाब में शेख जुबैर अली ज़ई ने फरमाया था,

'नमाज़ ए वित्र में रुकू से पहले क़ुनूत पढ़ने का ज़िक्र सुनन दरकुटनी (२/३२, हदीस- १६४४,वा सनद हसन) और सुनन नसाई (१,२४८ हदीस- १७००) में है। देखिये मेरी किताब हिदायतुल मुस्लिमीन (हदीस- २८ फैदा- ३)।

क़ुनूत ए वित्र में हाथ उठना किसी सरीह मारफू हदीस से साबित नहीं है।'

मालूम हुआ कि नमाज़ ए वित्र में रुकू से पहले हाथ उठे बिना क़ुनूत पढ़ना सही है।

और शेख जुबैर अली ज़ई के रिसाला अल हदीस जो जमादिल अव्वल १४२६ हिजरी में शाया हुआ था उसके सफा नंबर  पर एक सवाल किया गया था,

क्या क़ुनूत ए वित्र में हाथ उठा कर दुआ करना साबित है?

उसके जवाब में शेख ज़ुबैर अली ज़ई ने क़ुनूत ए वित्र में हाथ न उठाए कि दलील में एक रिवायत नकल की:

۩ अबू हातिम अल राज़ी (२७७ हिजरी) फ़रमाते हैं, 'अबू ज़राह (अल राज़ी २६४ हिजरी) ने मुझसे पूछा, 'क्या आप क़ुनूत में हाथ उठाते हो?

मैंने कहा, 'नहीं!' फिर मैंने उनसे पूछा, 'क्या आप (मुझे कुनूत) हाथ उठा ते हो?' अनहोने कहा: जी हां, मैंने पूछा, आपकी दलील क्या है? अनहोन कह, हदीस इब्न मसूद।

 मैंने कहा, लाईस बिन अबू सलीम ने रिवायत किया है। अन्होने कहा: हदीस अबू हुरैरा, मैने कहा: उसे इब्न लहया ने रिवायत किया है। अन्होने कहा, हदीस इब्न अब्बास, मैंने कहा, यूसे औफ (अल अरबी) ने रिवायत किया है। तोह उन्होंने पूछा, आपके पास (क्यूनूट मी) हाथ ना उठने की क्या दलील है?

मैंने कहा, हदीस ए अनस, कि बेशाक़ रसूलुल्लाह ﷺ किसी दुआ में हाथ नहीं उठते थे सिवाए इस्तिस्का के तो वो (अबू ज़राह र.अ.) खामोश हो गए।

तारीख़ बग़दाद, जिल्द २, सफ़ा- ७६ ताहेत- ४५५. वा सनद हसन, वा ज़िक्रुहु अल ज़हाबी फ़ी सियार आलम अल नुबाला १३/२५३)।

ये रिवायत नक़त करके क़ुनूत ए वित्र में हाथ न उठने की दलील देने के बाद शेख ज़ुबैर अली ज़ई ने उन रिवायत की तहक़ीक़ पेश की है और आख़िर में लिखा है, 'बेहतर यहीं है कि हदीस ए अनस र.ए. और दीगर दलाईल की आरयू से क़ुनूत में हाथ न उठे जाए।

वल्लाहु आलम.


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