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औरत का किन लोगों से परदा ना करना उचित है?

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अल्हम्दुलिल्लाह, 

औरत अपने महरम मर्दों से परदा नहीं करेगी।

और औरत का महरम वो है, जिस से इस का निकाह क़राबत दारी (करीबी खून का रिश्ता) की वजह से हमेशा के लिए हराम हो (मसलन बाप, दादा और इसे भी ऊपर वाले, बेटा पोता और इन की नाक, चाचा, मामू, भाई) , भतीजा, भांजा) या फिर रज़ा'अत (स्तनपान) के सबाब से निकाह हराम हो। [मसलन रजाई भाई, और रजाई बाप) या फिर मुशाहिरत (शादी) की वजह से निकाह हराम हो जाए।

ज़ैल में (आला) हम ये मौजु बिल तफ़सील पेश करते हैं:

۞ नस्बी महरम:

नस्बी तौर पर औरत के मेहरम की तफ़सील का बयान सूरह अल-नूर की जगह दी हुई आयत में बयान है:

फ़रमान ए बारी ता'आला है:

और अपनी जीनत जाहिर ना करो सिवाए इस के जो जाहिर है, और अपने गिरेबानों पर अपनी ओढ़नी (शॉल, दुपट्टा) डाले रखें, और अपनी ज़ीनत जाहिर ना करो सिवाए अपने खविंदो के या अपने वालिद के या अपने ससुर के या अपने लड़कों के या अपने ख़ौविंद के लड़कों के या अपने भाइयों के या अपने भाइयों के या अपने मेल जोल की औरतों के या गुलामों के या ऐसे नौकर चाकर मर्दों से जो शेहवात वाले ना हों, या ऐसे बच्चों के जो 'औरतों के पर्दे की बातों से मुतला' (इल्म वाले) नहीं...

सूरह नूर, आयत-३१

मुफ़स्सिरीन हज़रत (कुरान के टिप्पणीकार) का कहना है के, नस्ब (रक्त के संबंध) की बिना पर औरत के लिए जो महरम है इसकी सरहत आयत में बयान हुई है, वो आला हैं:

۩१. आबा व अजदाद (पूर्वज):

यानी औरत के वालिदैन के आबा वा अजदाद और ऊपर की नाक मसलन वालिद, दादा, नाना और रही बात उनके शौहर के बाद दादा की तो वो ससुराली महरम में शामिल है जिसका आगे बयान किया जाएगा।

۩२. बेटो (पुत्र):

यानी औरतों के बेटे जिस में बेटे, पोते, और इस तरह नाती यानी बेटी के बेटे और इन की नाक, और आयत ए करीमा में जो (खाविंद के बेटों) का जिक्र है वो खाविंद की दूसरी बीवी के बेटे हैं जो के महरम में शामिल है, और इसी तरह ससुर भी महरम मसहरत (शादी से महरम) में शामिल है, न के मेहरम नस्बी (खून से महरम) मुझे। हम इसे भी आगे चल कर बयां करेंगे।

۩३. औरत का भाई:

चाहे वो सगा भाई हो या फिर सौतेला भाई हो, चाहे सिर्फ वालिद की तरफ से हो या फिर सिर्फ वालिद की तरफ से हो, सभी इसमें शामिल हैं।

۩४. भांजे और भतीजे यानि भाई और बहन के बेटे और इन की नसलें।

५. चाचा और मामू :

ये दोनों भी नस्बी महरम माई से हैं। इन का आयत में ज़िक्र नहीं है क्योंकि ये दोनो माँ-बाप के तरह समझ जाते हैं, और लोगो में भी वालिदैन की जगह पर मशहूर होते हैं, और बाज़ औकात चाचा को भी वालिद कह दिया जाता है, जैसा के अल्लाह ताला का फरमान है:

"क्या तुम याकूब (अलैहे सलाम) की मौत के वक्त मौजूद थे? जब उन्हें अपने औलाद को कहा के मेरे बाद तुम किस की इबादत करोगी? तो सब ने जवाब दिया के आप के मबूद की और आप के वालिद इब्राहिम, इशहाक और इस्माइल के माबूद की, जो माबूद एक ही है और हम इसी के फरमानबरदार रहेंगे।”

सूरह बक़रह, आयत- १३

जब की इस्माइल अ.स. याक़ूब अ.स. के बेटे के चाचा थे.

तफ़सीर अल-रज़ी, २३/२०६; तफ़सीर अल-कुर्तुबी, १२/२३२, १३३; तफ़सीर अल-आलूसी, १८/१४३, फतह अल-बयान फाई मकासिद अल-कुरआन, सिद्दीक हसन खान द्वारा, ६/३५२।

۞ रज़ाअत (स्तनपान) की बिना पर महरम:

औरत के लिए रज़ात की वजह से भी महरम बन जाते हैं, तफ़सीर अल अलोसी में है:

"जिस तरह नस्बी महरम के सामने औरत के लिए परदा ना करना मुबाह है इसी तरह की रजात की वजह से महरम बनने वाले शख्स के सामने भी इसके लिए परदा ना करना मुबाह है। इस तरह औरत के लिए, इस तरह की रजाई बेतो हां रजाई वालिद से भी पर्दा ना करना जायज़ है।”

तफ़सीर अल-आलूसी। १८/१४३

इस लिए रजात की वजह से महरम होना भी नस्बी महरम की तरह है जो हमेशा के लिए निकाह हराम कर देता है।

इमाम अल-जस्सास र.अ ने इस आयत की तफ़सीर करते हुए इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है, "जब अल्लाह तआला ने वालिद के साथ उन महरम का ज़िक्र किया है जिन से उनका निकाह हमेशा हराम है, जो इस पर दलालत करती है के जो इस तरह है हुरमत वाला होगा इस का हुकुम भी उन्ही हुकुम के बराबर है, मसलन औरत की माँ, और रजाई महरम वगैरा"।

अल-जस्सास द्वारा अहकाम अल-कुरान, ३/३१७।

और सुन्नत ए नबवी ﷺ में भी इस की दलील मिलती है:

नबी ﷺ का फ़रमान है, "रज़ात भी वही हराम करती है जो नसब करता है।"

तो इसका मतलब ये हुआ कि जिस तरह औरत के नस्बी महरम होंगे, इसी तरह रजात के सबाब से भी महरम होंगे। सहीह अल बुखारी में आला दी हुई हदीस वारिद है:

अम्मी आयशा र.अ. बयान करती हैं के, परदा का हुक्म नाज़िल होने के बाद अबू क़ैस के भाई अफलाह जो कि आप के रजाई चाचा थे, आए और अंदर आने की इजाज़त तालाब की, तो मैंने इजाज़त देने से इंकार कर दिया, और जब रसूल ए अकरम ﷺ घर तशरीफ़ लाए तो मैंने जो कुछ किया था आप ﷺ को बताया, तो नबी ए करीम ﷺ ने हुकुम दिया के माई उनको अंदर आने की इजाज़त दे दूं।

सहीह अल-बुखारी बी शरह अल-अस्कलानी, ९/१५०।

इमाम मुस्लिम रह. ने भी इस हदीस को रिवायत किया है जिसके अल्फ़ाज़ ये हैं:

उर्वाह र.अ. बयान करते हैं के अम्मी आयशा र.ए. ने इन्हें बताया के, उन्हें रजाई चाचा जिन का नाम अफला था, उन्हें अंदर आने की इजाज़त तालाब की, तो मैंने उन्हें इजाज़त न दी, और उनसे परदा कर लिया। फिर इसकी खबर अल्लाह के रसूल ﷺ को दी तो आप ﷺ ने उनसे फरमाया, उनसे परदा ना करो, इस लिए के रजा से वो सभी रिश्ते (निकाह) हराम हो जाते हैं जो नसब से हराम होते हैं..

सहीह मुस्लिम बी शरह अल-नवावी, १०/२२।

औरत के रजाई महरम भी उसके नस्बी महरम की तरह हैं:

फ़ुक़हा ए करम ने जो कुछ कुरान मजीद और सुन्नत ए नबवी ﷺ से साबित है उस पर अमल करते हुए इस बात की सरहत की है कि औरत के रजाई महरम भी इस के नस्बी महरम की तरह ही है, लिहाजा इस के लिए रजाई महरम के सामने है ज़ीनत की चीज़ जाहिर करना जायज़ है, जिस तरह के नसबी महरम के सामने करना जायज़ है, और उसके लिए भी औरत के बदन की वो जगह देखनी हलाल हैं जो नसबी महरम के लिए देखनी हलाल हैं।

۞ ससुराली रिश्ते की वजह से महरम: (यानी निकाह की वजह से)

औरत के लिए ससुराल रिश्ते के कारण से महरम वो लोग हैं जिन पर हमसे निकाह करना हमेशा के लिए हराम है, जैसे, वालिद की बीवी, बेटे की बीवी, सास यानी बीवी की वालिदा।

शरह अल-मुन्तहा, ३/७

तो इस तरह वालिद की बीवी के लिए महरम वो बेटा होगा जो हमारी दूसरी बीवी से हो, और बहू यानि बेटे की बीवी के लिए शौहर का बाप यानि ससुर महरम होगा, और सास यानि बीवी की माँ के लिए खाविन्द यानि दामाद महरम होगा।

अल्लाह अजवाज़ल ने सूरह अल नूर की आयत में ज़िक्र करते हुए फरमाया है:

और अपनी ज़ीनत जाहिर ना करो सिवाए इस के जो जाहिर है, और अपने गिरेबानों पर अपनी ओढ़नी (शॉल, दुपट्टा) डाले रखें, और अपनी ज़ैब ओ आराइश को किसी के सामने जाहिर ना करो सिवाए, अपने खविंदो के हां, अपने वालिद के हां अपने ससुर के या अपने लड़कों के हां, अपने खविंद के लड़कों के हां, अपने भाइयों के हां, अपने भाइयों के हां, अपने भाइयों के हां अपने मेल जोल की महिलाओं के या गुलामों के या ऐसे नौकर चाकर मर्दों से जो शेहवात वाले ना हों , हां ऐसे बच्चों के जो औरतों के पर्दे की बातों से मुतला' (इल्म वाले) नहीं...

सूरह नूर, आयत-३१.

तो मैं ससुर हूं, और खाविंद के बेटा औरत के लिए ससुराली रिश्ते की वजह से महरम है, और अल्लाह तआला ने इन्हें उन के बापों और बेटों के साथ जिक्र किया है और उन्हें हुकुम में भी बराबर करार दिया है, के उन से परदा ना करना जायज़ है.

अल-मुगनी, ६/५५५


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