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ख़ाते वक़्त सलाम करने के अहकाम

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खाते वक्त सलाम करने में कोई हर्ज नहीं है, सुन्नत में ऐसा कुछ है जो कहता है कि ये अमल की इज्जत नहीं है। ये दूर तक फेल हुई अफ़वाह है कि खाने के वक़्त सलाम नै करना चाहिए ("ला सलाम 'अला ता'आम") या सलाम का जवाब नै देना चाहिए।

अल-'अजलूनी (रहीमुल्लाह) ने कशफ अल-खफा' में कहा: (ये जुमला) खाने के वक्त सलाम नहीं करना चाहिए ये हदीस नहीं है। अंत उद्धरण.

कुछ उलेमा ने कहा है कि खाना खाते वक्त हाथ नई मिला सकता है लेकिन सलाम करने में कोई हर्ज नई है।

इमाम नवावी (रहीमुल्लाह) अल-अधकार में फरमाते हैं। इसकी एक मिसाल कुछ ऐसी है कि अगर कोई खा रहा हो और हमारे मुंह में निवाले हो, अगर कोई उसे सलाम करता है तो वो सलाम के जवाब का मुश्तहिक नहीं है। लेकिन अगर वो खाना खा रहा हो और उसके मुंह में निवाले न हो तो उसको सलाम का जवाब देना चाहिए।

शेख 'अब्द अल-रहमान अल-सुहैम (रहीमुल्लाह) कहते हैं: ये कलाम लोगों की बात है और कोई हदीस नहीं है। इसका मतलब सही है अगर ये हाथ मिलाने के पशेमंजर में कहा गया है लेकिन अगर ये सिर्फ सलाम कहने के लिए मेरे पास है तो ये मन नई है जब कोई खा रहा हो। अंत उद्धरण.

http://www.almeshkat.net/index.php?pg=qa&ref=1027

और अल्लाह सब से बेहतर जानता है।

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